Sunday, 31 March 2013

ग़जल/ पिघल गया होगा


जब जिक्र मेरा हुआ होगा
वो कुछ पिघल तो गया होगा

जी भर तुझे देख ही लेता
ओझल कहीं हो गया होगा

अब सांस भर जी नहीं सकते
इस शहर में कुछ धुंआ होगा

दरिया यहां सूखने को है
पानी कहां बह गया होगा

इस आंख में हिज्र के आंसू
दिल में तूफां सा रहा होगा

बुनियाद हिलने लगी है जो
पत्थर खिसकने लगा होगा

          - बृजेश नीरज

14 comments:

  1. ....लाज़वाब गज़ल गज़ल का हर शेर मर्मस्पर्शी....मन को छूती हुयी गज़ल

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  2. बहुत लाजबाब और सार्थक ग़ज़ल की प्रस्तुति.

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    1. राजेन्द्र जी आपका आभार!

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  3. मूर्खता दिवस की मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (01-04-2013) के चर्चा मंच-1181 पर भी होगी!
    सूचनार्थ ...सादर..!

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    1. गुरूदेव आपका आभार!

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  4. बहुत सुंदर

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  5. भई वाह ... हर शेर लाजवाब ...
    पानी जरूर बह गया होगा ... ओर सभी शेर भी कमाल के ...

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    1. आपका आभार! आपकी हौसला अफज़ाई से लिखने का साहस बढ़ा!

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  6. गहन अनुभूति बेहतरीन सुंदर सहज सार्थक रचना
    बहुत बहुत बधाई

    आग्रह है मेरे ब्लॉग में भी सम्मलित हों
    मुझे ख़ुशी होगी

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