Monday, 25 February 2013

छांव की आस है


तेज धूप में छांव की आस है
रेत के बीच बढ़ रही प्यास है

हाथ में तीर और तलवार है
वो जो मेरे दिल के पास है

कथन के अर्थ को समझ लेना
अपनों की अपनों से खटास है

बाल धूप में सफेद होने लगे
तेरी उम्र में फिर क्या खास है

वो कल जिंदा था आज लाश है
विरोध उनको आता नहीं रास है
               - बृजेश नीरज

6 comments:

  1. बेह्तरीन अभिव्यक्ति .शुभकामनायें.

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  2. बहुत उम्दा प्रस्तुति,आभार.

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  3. आज के परिवेश में जीवन समस्याओं से जलरहा है।वास्तव में छांव की आवश्यकता हम सभी को है।
    सटीक एवं सुन्दर अभिव्यक्ति!

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    1. बाल धूप मे सफ़ेद होने..............................वाह !

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