Saturday, 4 May 2013

तुम्हारी आंखों में


जिस्म पर उभरी लकीरें
गवाह हैं
उन रास्तों की
जिनसे होकर गुजरा हूं
और बार बार
असफल
फिर फिर लौटा हूं
तुम्हारे पास
याचना लिए
प्रेम के छांव की।

अपने दंभ में
आगे निकल जाता हूं
तुम्हें पीछे छोड़
लेकिन
वक्त से टकराकर
लौटना पड़ता है
तुम्हारे पास
उंगली थामने।

यूं ही नहीं गुजरा वक्त
यूं ही नहीं उभरी लकीरें
चेहरे पर
शरीर पर
ये गवाह हैं
उन पलों की
जब तुमने थामा है
मेरा हाथ
जो कांपने लगे थे पांव।

तुम हमेशा ही
एक उम्मीद थी
मैं ही आंख मूंदे रहा
अपने सपनों से
जो हमेशा तैरते रहे
तुम्हारी आंखों में।
          - बृजेश नीरज

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