Wednesday, 8 May 2013

मेरी आवश्यकता


अभी तक
संजोए हुए था
अपना एक आकाश
और एक धरती

लेकिन जाने
कहां से तुम गए
मेरे जीवन में

तोड़ दिए
मिथक जीवन के

वे झरोखे
बंद हो गए
जहां से देखता था
आकाश
टूट गए वो पैमाने
जिनसे नापता था धरती को

तुम्हारे प्रेम में
विस्तार पा गया मेरा आकाश
तुम्हारे स्पर्श ने
दे दिया असीम व्यास मेरी धरा को।

तुम्हारा आना
एक इत्तेफाक हो सकता है
लेकिन तुम्हारा होना
अब मेरी आवश्यकता।
               - बृजेश नीरज

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