Friday, 22 March 2013

दम तोड़ देगी


21 मार्च विश्व कविता दिवस पर ‘कविता’ की याद में!


कविता कराह रही है
गली के नुक्कड़ पर पड़ी हुई

तेज रफ्तार जिंदगी
रौंदकर चली गयी उसे

स्वार्थ और वासना के वस्त्रों पर
प्रेम की ओढ़नी ओढ़े
समाज तमाशबीन खड़ा है

कोई पुरसाहाल नहीं

मुक्तिबोध कहीं धूल फांक रहे
त्रिलोचन रहे नहीं
निराला का तो कंकाल भी नहीं बचा

कौन दे सहारा उसे

बैसाखियों पर कविता चलती नहीं

तो क्या दम तोड़ देगी
वहीं पड़े-पड़े?
-        बृजेश नीरज

10 comments:

  1. वाह भाई वाह क्या विचारणीय चित्रण किया कविता का | आभार

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
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  2. तमाम कुकुरमुत्ते भले ही उग आये हों उसके के नाम से,पर कविता का अस्तित्व अभी विद्यमान है !

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    1. आपने मेरी रचना पर टिप्पणी की मेरा लिखना आज सार्थक हुआ!

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  3. कविता थी है ओर रहेगी
    कविता को मिल जाएंगे कंधे
    लार काल में ढोने के लिए
    क्या हुआ जो नहीं होगी ऊंचाई पे
    वैसे भी कौन रह सका है ऊंचाई पे
    जब तक है प्राकृति जीवित
    रहेगी कविता हमेशा ...

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    1. आदरणीय बहुत सुन्दर! आप जैसे प्रेमियों ने ही तो जिन्दा रख रखा है उसे! आभार!

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  4. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (24-03-2013) के चर्चा मंच 1193 पर भी होगी. सूचनार्थ

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    1. आपका आभार अरूण जी!

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  5. बहुत सुन्दर ...
    पधारें " चाँद से करती हूँ बातें "

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