Thursday, 28 March 2013

गज़ल/ अनजान रहा अक्सर


दीदार का बस तेरे अरमान रहा अक्सर
इस प्यार से तू मेरे अनजान रहा अक्सर

बाजार में दुनिया के हर चीज तो मिलती है
तेरे हबीबों में भी धनवान रहा अक्सर

जिस वक्त दुनिया में था घनघोर कहर बरपा
उस वक्त भी रौशन ये श्मशान रहा अक्सर

हर ओर इन गलियों में इक शोर सा मचता है
हाकिम का ही तो यह भी एहसान रहा अक्सर

मेरी मुरादों ने अपना रूप बदल डाला
ईमान के चक्कर में नुकसान रहा अक्सर
               -        बृजेश नीरज

कृपया ध्यान दें

इस ब्लाग पर प्रकाशित किसी भी रचना का रचनाकार/ ब्लागर की अनुमति के बिना पुनः प्रकाशन, नकल करना अथवा किसी भी अन्य प्रकार का दुरूपयोग प्रतिबंधित है।

ब्लागर