Thursday, 3 January 2013

लेख - अगस्त क्रान्ति


     क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद बंबई में 7 अगस्त 1942 को कांग्रेस कार्यसमिति में महात्मा गांधी बोले थे-'कांग्रेस से मैंने यह बाजी लगवाई है कि या तो देश आजाद होगा अथवा कांग्रेस खुद फना हो जाएगी। 'करो या मरो' हमारा मूल मंत्र होगा।' 8 अगस्त को कांग्रेस कार्यसमिति ने 'अंग्रेजों भारत छोड़ोप्रस्ताव स्वीकृत किया। 9 अगस्त को गांधी जी समेत राष्ट्रीय आन्दोलन के सभी बड़े नेता गिरफ्तार किए गए। सारे देश में गिरफ्तारी और दमन चक्र पूरे वेग से प्रारंभ हो गया।
     9 अगस्त 1925 को ब्रिटिश सरकार का तख्ता पलटने के उद्देश्य से बिस्मिल के नेतृत्व में हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र संघ के दस जुझारू कार्यकर्ताओं ने 'काकोरी काण्ड' किया था जिसकी यादगार ताजा रखने के लिए पूरे देश में प्रतिवर्ष 9 अगस्त को 'काकोरी काण्ड स्मृति दिवस' मनाने की परम्परा भगत सिंह ने प्रारम्भ कर दी थी। इस दिन बहुत बड़ी संख्या में नौजवान एकत्र होते थे। गांधी जी ने एक सोची समझी रणनीति के तहत 9 अगस्त 1942 का दिन चुना था। यह भारत को तुरन्त आजाद करने के लिए अंग्रेजी शासन के विरूद्ध एक अवज्ञा आन्दोलन था।
     हालांकि गांधीजी को गिरफ्तार कर लिया गया था लेकिन देश भर के युवा कार्यकर्ता हड़तालों और तोड़फोड़ की कार्यवाहियों के जरिए आंदोलन चलाते रहे। लाल बहादुर शास्त्री ने 'मरो नहीं मारो' का नारा दिया जिसने क्रान्ति की दावानल को पूरे देश में प्रचण्ड कर दिया। कांग्रेस में जयप्रकाश नारायण जैसे सदस्य भूमिगत प्रतिरोधी गतिविधियों में सबसे ज्यादा सक्रिय थे। पश्चिम में सतारा और पूर्व में मेदिनीपुर जैसे कई जिलों में स्वतंत्र सरकार, प्रतिसरकार की स्थापना कर दी गयी थी। अंग्रेजों ने आंदोलन के प्रति काफी सख्त रवैया अपनाया। कांग्रेस को गैरकानूनी संस्था घोषित कर दिया गया। फिर भी इस विद्रोह को दबाने में सरकार को साल भर से ज्यादा समय लग गया। सरकारी आंकडों के अनुसार इस जनान्दोलन में 940 लोग मारे गये, 1630 घायल हुए, 18000 डी आई आर में नजरबन्द हुए तथा 60229 गिरफ्तार हुए।
     भारत छोड़ो आंदोलन सही मायने में एक जनांदोलन था जिसमें लाखों आम हिंदुस्तानी शामिल थे। इस आंदोलन ने युवाओं को बड़ी संख्या में अपनी ओर आकर्षित किया। उन्होंने अपने कालेज छोड़कर जेल का रास्ता अपनाया।
     1946 में कैबिनेट मिशन भारत आया। इस मिशन ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग को एक ऐसी संघीय व्यवस्था पर राजी करने का प्रयास किया जिसमें भारत के भीतर विभिन्न प्रांतों को सीमित स्वायत्तता दी जा सकती थी। कैबिनेट मिशन का यह प्रयास विफल रहा। वार्ता टूट जाने के बाद जिन्ना ने पाकिस्तान की स्थापना के लिए 16 अगस्त 1946 को एक प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस का आह्वाहन किया। उसी दिन कलकत्ता में खूनी संघर्ष शुरू हो गया। यह हिंसा कलकत्ता से शुरू होकर ग्रामीण बंगाल, बिहार और संयुक्त प्रांत पंजाब तक फैल गई।
     फरवरी 1947 में वावेल की जगह लाॅर्ड माउंटबेटन को वायसराय नियुक्त किया गया। जब सुलह के लिए उनका प्रयास भी विफल हो गया तो उन्होंने ऐलान कर दिया कि ब्रिटिश भारत को स्वतंत्रता दे दी जाएगी लेकिन उसका विभाजन भी होगा। औपचारिक सत्ता हस्तांतरण के लिए 15 अगस्त का दिन नियत किया गया।
        15 अगस्त 1947 को राजधानी में हो रहे उत्सवों में महात्मा गांधी नहीं थे। उस समय वे कलकत्ता में 24 घंटे के उपवास पर थे। उन्होंने इतने दिन तक जिस स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया था वह एक अकल्पनीय कीमत पर उन्हें मिली थी। उनका राष्ट्र विभाजित था। हिंदू मुसलमान एक दूसरे की गर्दन पर सवार थे। गांधी जी देश की स्थितियों पर दुखे थे। 
     गांधीजी आज भी दुखी होंगे। देश की स्थितियां 1947 से भी बुरी हैं। देश धर्म, जाति, सम्प्रदाय, क्षेत्र में बंट चुका है। दंगे होते ही रहते हैं, आज इस कोने में तो कल दूसरे कोने में। हाल ही में बरेली, कोसीकलां, प्रतापगढ़ के दुर्गागंज और अस्थान गांव और अब असम में साम्प्रदायिक दंगों की आग सुलग रही है लेकिन देश के नेता म्यांमार में मुसलमानों पर हो रही ज्यादतियों को लेकर तो चिंता व्यक्त करते हैं लेकिन देश में साम्प्रदायिक सौहार्द बढ़ाने का कोई प्रयास नहीं करते। करें भी तो क्यों, इससे उनके वोट बैंक को नुकसान जो पहुंचने वाला है। 'जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए' का नारा सत्ता के गलियारे के किसी कोने में पड़ा धूल फांक रहा है। राजनीति धन कमाने का साधन बन चुकी है तो नेता निरंकुश और सत्ता अराजक। जनता के हितों की रक्षा करने के बजाय धर्म, जाति, क्षेत्र के नाम पर उसे बरगलाया जा रहा है। तभी तो कभी मूर्ति टूटने पर आंदोलन शुरू हो जाते हैं तो कभी दूसरे प्रदेश के लोगों को अपने प्रदेश से बाहर निकालने के लिए। हद तो यह है कि हिंसा के विरोध में जमा लोग भी हिंसा करने लगते हैं। मजेदार बात यह कि महंगाई को लेकर लोग सड़कों पर नहीं उतरते जबकि उससे सबसे ज्यादा प्रभावित वे ही हैं।
     दरअसल पूरी सोची समझी रणनीति के तहत ऐसी व्यवस्था की गयी है कि लोग समाज में विभाजित ही रहें। कुंए के बाहर की दुनिया के बारे में सोचने समझने का उन्हें मौका मिले। देश का तथाकथित समझदार वर्ग जिसे बुद्धिजीवी या इलीट के नाम से जाना जाता है वह भी इस व्यवस्था को बनाए रखने में सहयोग कर रहा है। सत्ता से जुड़े लाभों का मोह उसे सत्ता की खिलाफत की इजाजत नहीं देता।
     कभी कभार कुछ प्रयास जरूर होते हैं। जैसा कि 1975 में जयप्रकाश नारायण के नतृत्व में 'संपूर्ण क्रान्ति' आंदोलन के दौरान हुआ। परन्तु, वह प्रयास भी व्यवस्था परिवर्तन में विफल रहा। एक प्रयास आजकल हो रहा है।
     समाजसेवी अन्ना हजारे और बाबा रामदेव भ्रष्टाचार और काले धन के मुद्दे पर सत्ता पर उंगली उठाए हैं। एक साल से देश भर में दोनों ने अलख जगा रखी है। नीयत कुछ भी हो, वे स्वयं में कैसे भी हों, लेकिन उनके द्वारा उठाए गए मुद्दे सही हैं, देश हित में हैं।
     अन्ना और रामदेव दोनों ने घोषणा कि अगस्त में देश में 'अगस्त क्रान्ति' होगी। 25 जुलाई से शुरू हुआ अन्ना आंदोलन अगस्त लगते ही राजनैतिक पार्टी बनाने की घोषणा के साथ टांय टांय फिस्स हो गया। आगे उनकी पार्टी क्या करेगी कहा नहीं जा सकता। हालांकि शुरूआती घोषणाएं तो बहुत आकर्षित करती हैं।
9 अगस्त से रामदेव जरूर रामलीला मैदान में डटे। जनता उम्मीद कर रही है कि शायद बाबा इस बार रात में अनशन स्थल से भागें। लेकिन कल क्या होगा, कौन कह सकता है? अभी तो बाबा की टीम बालकृष्ण और राजबाला को शहीद का दर्जा दिलाने पर आमदा है।
     इन दोनों ही प्रयासों में एक समानता है कि देश की आम जनता, जो गांवों में बसती है, जिसके पास इंटरनेट तो छोड़िए शहर तक पहुंचने के लिए साधन भी नहीं उपलब्ध हैं, वह जनता जिसके दो जून की रोटी का भी ठिकाना नहीं है, उसे अपने आंदोलन में साथ लाने का कोई प्रयास नहीं किया गया।
बहरहाल, देश जस का तस है। लोग महंगाई की मार से बेहाल किसी किसी बहाने एक दूसरे की गर्दन काटने में लगे हैं; नेता मदमस्त हैं और सत्ता नशे में चूर। इस देश का क्या होगा? क्या कभी कोई 'अगस्त क्रान्ति' इस देश में फिर होगी जो संविधान के मूल मंत्र 'जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए' को फिर से जीवंत कर सके।
 बौने जबसे मेरी बस्ती में आकर रहने लगे हैं,
रोज कदकदावत के झगड़े होने लगे हैं।
मुझे सोने दो, मत जगाओ वरना,
हस्ती के हिसाब होने लगे हैं। 
                                                     - बृजेश नीरज

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